Durganandan

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स्मृति कलश

असमय ही छलक पड़ता है स्मृति कलश, गिरती है बूँदें आरक्त कपोलों पर। कभी तप्त था जो तुम्हारे स्पर्श से, अब तुम्हारी स्मृति से शीतल।

प्रेम कविता

प्रेम कविता


TI मॉल की छत पर हमने
देखे थे तुम्हारे साथ कुछ सपने
मिक्सियों और टीवी को निहारते हुए
मेरी निगाह बार बार देखती थी तुमको
ठीक उसी बीच तुम्हारी नज़र पड़ गई
परफ्यूम की एक खूबसूरत शीशी पर
कहने का तरीका तो आसानी से मिल गया
हमने शीशी खरीदी और बिल पे कर दिया
मगर कहने का अर्थ बदल गया
मॉल से बाहर निकलते हुए तुमने
कॉफी की चुस्की के बाद कहा था
पता नहीं टीवी और मिक्सी की तरह
तुम भी क्यों पसंद आते हो मुझको
लगता है कि मैंने तुम्हें पसंद किया है
और बिल किसी और ने पे किया है
हाथ पकड़ कर चलती हूं तो साथ साथ लगता है
साथ साथ चलती हूं तो जकड़ा जकड़ा सा लगता है
कहीं से खुद को छुड़ा कर आती हूं जब तुम्हारे पास
न जाने क्यों हर बार बंधा बंधा सा लगता है
मल्टीप्लेक्स की अंधेरी सीट पर पॉप कॉर्न के दाने
हमारे प्यार के लम्हों को कितना कुरकुरा बना देते हैं
एक्सलेटर की सीढ़ियों पर खड़े खड़े क्यों नहीं लगता
कि तुम्हारा हाथ थाम कर कुछ देर यूं ही उतरती रहूं
वहां भी तुम इस छोर होते हो मैं उस छोर होती हूं
मॉल में तमाम खरीदारियों के बीच हमारा प्यार
अक्सर पेमेंट के बाद न जाने क्यों टिसता रहता है
हमदोनों के लिए मोहब्बत किसी शॉपिंग मॉल है
जहां हर सामान दूसरे सामान से बेहतर लगता है
जनम जनम का साथ नहीं अगले सीज़न का इंतज़ार लगता है।